अकेला रहना सिखों
हम ख़ौफ़ज़दा हैं।इसलिए हम अकेले रहने से डरते हैं।और हर समय किसी का साथ माँगते है।
कोई दोस्त मील जाएं कोई जगह मील जाएं कही भीड़ मील जाएं हम अकेला नही रहना चाहतें।
क्योंकि अकेला होते ही जो खुद की असलियत है।
खुद की वास्तविक हलात है वो सामने आने लगती हैं।
दुसरे की मौजूदगी मे हम दूसरो मे उलझे हुए रहते है
और हमे पता नही चलता।
दुसरे का जो तलाश हैं वो अपने से दूर भागने की तलाश के सिवाए और कुछ नही हैं और यही सच्चाई है कुछ हद तक मेरे नजर मे।
किस हद तक हम कमजोर हैं ये बात समझने कि ज़रूरत हैं और इसपर काम करने की ज़रूरत है।
और हाँ दूसरो की ज़िन्दगी मे अपनी जगह ढूंढना बंद करो तुम्हारी जहग सिर्फ तुम्हारे ही भीतर हैं।
कोई खुद बुलाए तो हर्ज़ नही अपनी असल जगह जहाँ है बेहतर हैं उसे ही फुर्सरत से तराशो इससे तुम अपने आप को खोते जओगे।
और किसी और के आदि हो जाओगे बर्बाद रहकर रह जओगे बेहतर यही है की उस कमजोरी से लड़ो जो तुम्हे भीड़ बनने पर मजबुर करता हो,किसी कि सहारा को मजबुर करता हो,उसे तब्दील करना सिखों।
मत भूलना की तुम्हे आखिरी मे अकेले ही रह जाना हैं।
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